मेरी बचपन वाली होली ||

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वो पिचकारी खरीदने के लिए ज़िद्द करना
और दुकान पे ढेर से रंग बटोरना,
वो हफ्ते पहले से तैयारी करना
और नए कपड़े पहनने के लिए उत्साहित होना,
न जाने कहाँ गुम सा गया है ||

वो दोस्तो के संग पानी वाले गुब्बारे फुलाना
और राह चलते लोगों पर दे मारना,
वो लोगो के चेहरे पर गाढ़े रंग लगाना
और टीचर के डर से अपना रंग छुड़ाना,
न जाने कहाँ गुम सा गया है ||

वो माँ से छुपके पुए खाना
और भईया के प्लेट से दही-बड़े चुराना,
वो शाम में मेहमानों का स्वागत करना
और फिर पापा के साथ दूसरों से मिलने जाना,
न जाने कहाँ गुम सा गया है ||

वो पड़ोस वाली आंटी के घर छोले खाना
और दोस्तो को माँ के हाथों की मिठाई खिलाना,
न जाने कहा गुम सा गया है ||

ना जाने वो रंगों की बरसात
और अबीर का आशीर्वाद
कहाँ गुम सा गया है ||

मेरी ही आंखों के सामने
जाने कैसे सब खो गया है।
इस भागती जिंदगी में न जाने
मेरा बचपन कहाँ गुम सा गया है ||

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An engineer by occupation and a traveler by heart, I also like to dabble in writing the occasional article. I am also a newbie in the world of books, finding my way. What I write here are simply excerpts from my curious mind.

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