जिंदगी और पतंग

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बस यूँही बैठा था आज, हल्की सी धूप थी और नीले आसमान में हजारों रंग बेफिकर बिखरे पड़े थे। पर सब के सब मँझो में बंधे हुए।

हाँ, मैं पतंगों की ही बात कर रहा हूँ। उन्हें देख कर पहले तो बड़़ा अच्छा लगा फिर एक अजीब सी बेचैनी हुई।  ऐसा लगा मानो पतंगों को नहीं अपनी जिंदगी को देख रहा  हूँ।  और ऊँचा उड़ना तो चहती है पर बँधी है। कुछ अटखेलियां तो करना चाहती है पर मांझा तो किसी और ने ही पकड़ के रखा है।  काश कि  सबकुछ अपने हाथों में होता, थोड़ा और ऊँचा उठता,  थोड़ा और ऊँचा उड़ता, फिर वहाँ से देखता अपनी जिंदगी, कुछ अलग सी ही बात होती, शायद कुछ सुकून सा मिलता।  जो भी होता अपना होता। दिमाग बस इन्हीं बातों में उलझा पड़ा था की नज़र एक पतंग पर गयी जो कट चुकी थी। उसकी रफ़्तार देख दिल को  बड़ी खुशी मिली, और मैं कुछ आगे बढ़ा ताकि उसे थोड़े और करीब से देख पाऊँ।  अभी तो वो आसमान  छूने निकली ही थी फिर अचानक जमीन की ओर रुख क्यूँ किया उसने? अब तो वो आज़ाद थी फिर नीचे की ओर आने का क्या मतलब बनता था? और फिर अचानक दिखी वो बिजली के तारों पर बेबस झूलती हुई।
उसकी बेबसी देख झटका सा लगा, फिर समझ आया कि डोरों से बंधना भी क्यों ज़रूरी है। आज़ादी की उड़ान में मज़ा तो है पर बिना डोर के शाम ढलने पर घर का रास्ता कैसे पता चले?
कुछ डोरों से बंधी है जिंदगी तभी अच्छी है , वरना शायद किसी रोज यूंही बेबस होकर दम तोड़ देती…

सह लेखिका:- प्रकृति शर्मा

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