कुछ बेवज़ह

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की ना पूछ मुझसे मेरी दास्तां-ए-मोहब्बत ,
बस कुछ बेवज़ह ही कर के देखा था ।
बस यूं ही इश्क में डूब कर देखा था ॥

फिर सज़दे किये थे हजारों , इबादतों में उसका ही नाम लिया था ।
आफ़ताब से दिल लगा कर, फ़ना खुद को सरेआम किया था ॥

बस कुछ बेवज़ह ही कर के देखा था ।
बस यूं ही इश्क में डूब कर देखा था ॥

उफ़! वो नशीली शाम और उसकी लबों का जाम ,
उसकी आँखें, मानो कायनात देखा था ।
लफ़्ज़ों की नज़ाकत , जैसे शब़नम से चुराई हो ,
मुसलसल उसे हर ख़्वाब में देखा था ॥

बस कुछ बेवज़ह ही कर के देखा था ।
बस यूं ही इश्क में डूब कर देखा था ॥

सेहर की खुशबू , शफ़क़ की रूहानियत लिये ,
एक खत अपने इज़हार का उसके नाम लिखा था ।
फिर देखा था उसे किसी और की बाहों में क़यामत की रोज़ ,
हयात को अपनी उन्स़ की आग में जल जाते देखा था  ॥

बस कुछ बेवज़ह ही कर के देखा था ।
बस यूं ही इश्क में डूब कर देखा था ॥

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